April 14, 2026

औद्योगिक विस्तार की आंधी में घुटती रायगढ़ की सांस, तमनार में प्रस्तावित जनसुनवाई पर उठे गंभीर सवाल

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रायगढ़। छत्तीसगढ़ के औद्योगिक मानचित्र पर तेजी से उभरते तमनार क्षेत्र में एक बार फिर बड़े विस्तार की आहट ने स्थानीय लोगों की चिंता बढ़ा दी है। छत्तीसगढ़ पर्यावरण संरक्षण मंडल द्वारा जारी आधिकारिक सूचना के अनुसार, मैसर्स शांभवी इस्पात प्राइवेट लिमिटेड अपने स्टील प्लांट के व्यापक विस्तार की तैयारी में है। इस प्रस्तावित परियोजना को लेकर 21 अप्रैल 2026, सुबह 11 बजे ग्राम-तमनार में जनसुनवाई निर्धारित की गई है।

लेकिन इस जनसुनवाई की प्रकृति को लेकर सवाल पहले ही खड़े हो चुके हैं—क्या यह सचमुच जनता की आवाज सुनने का मंच होगा, या केवल औपचारिकता निभाने का एक और अध्याय?

*⚠️ कागज़ी प्रक्रिया या जनमत का सम्मान?*

पर्यावरणीय स्वीकृति के लिए जनसुनवाई अनिवार्य प्रक्रिया है, जिसमें प्रभावित नागरिकों को अपनी आपत्तियाँ और सुझाव रखने का अधिकार होता है। लेकिन स्थानीय स्तर पर यह धारणा मजबूत होती जा रही है कि ऐसी जनसुनवाईयाँ अब केवल “पूर्व-निर्धारित फैसलों को वैधता देने” का माध्यम बनती जा रही हैं।

ग्रामीणों का आरोप है कि इन बैठकों में वास्तविक प्रभावितों की आवाज भीड़ और व्यवस्थागत नियंत्रण के बीच दब जाती है, जबकि समर्थन और विरोध—दोनों ही पक्षों में प्रायोजित उपस्थिति का प्रभाव दिखता है।

*🏭 क्या है प्रस्तावित विस्तार?*

आधिकारिक सूचना के अनुसार, परियोजना में निम्नलिखित इकाइयों का विस्तार शामिल है—

2×350 टीपीडी डीआरआई किल्न

2×10 मेगावाट पावर प्लांट

1×10 मेगावाट एफबीसी पावर प्लांट

1×9 एमवीए फेरो एलॉय यूनिट

ब्रिक निर्माण एवं अन्य सहायक इकाइयाँ

यह विस्तार पहले से औद्योगिक दबाव झेल रहे क्षेत्र में और अधिक पर्यावरणीय बोझ जोड़ने वाला माना जा रहा है।

🌫️ पहले से ही संकट में पर्यावरण

तमनार और आसपास के गांव पहले से कोल माइंस, डोलोमाइट खदानों और क्रशर इकाइयों के कारण प्रदूषण की गंभीर मार झेल रहे हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार—

हवा की गुणवत्ता लगातार गिर रही है

जल स्रोत दूषित हो रहे हैं

सांस और त्वचा से जुड़ी बीमारियाँ बढ़ रही हैं

खेती और आजीविका पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है

ऐसे में नए विस्तार से हालात और बिगड़ने की आशंका व्यक्त की जा रही है।

❗ विकास बनाम अस्तित्व की बहस

रायगढ़ में औद्योगिक विकास और पर्यावरणीय संतुलन के बीच टकराव अब खुलकर सामने आने लगा है। एक ओर निवेश और रोजगार की बात की जा रही है, वहीं दूसरी ओर स्थानीय जनजीवन, स्वास्थ्य और प्राकृतिक संसाधनों पर पड़ते प्रभाव को लेकर चिंता गहराती जा रही है।

सबसे बड़ा सवाल यही है—
क्या विकास की कीमत पर लोगों की सांस, पानी और जमीन को नजरअंदाज किया जा सकता है?

🗣️ जनभागीदारी का असली इम्तिहान

21 अप्रैल की जनसुनवाई केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि यह तय करेगी कि लोकतांत्रिक भागीदारी का अर्थ क्या रह गया है—सिर्फ कागजों तक सीमित औपचारिकता या वास्तव में जनता की आवाज का सम्मान।

अब देखना यह है कि तमनार की यह जनसुनवाई जनमत का मंच बनती है या फिर एक पूर्वनियोजित प्रक्रिया का हिस्सा बनकर रह जाती है।