September 24, 2026

लैलूंगा का ‘अजूबा’ : सरकारी आदेशों की ‘तेरहवीं’ मनाकर निजी कमरों में फली-भूत हो रहा ‘लूट का आधार’!…

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लैलूंगा (व्यंग्य ब्यूरो)। अगर आपको लगता है कि भारत में नियम सबके लिए समान हैं, तो आपको एक बार लैलूंगा की पावन धरती पर कदम रखना चाहिए। यहाँ नियम और कायदे तहसील के दफ्तर में नहीं, बल्कि निजी कमरों की बंद दीवारों के पीछे दम तोड़ते नजर आते हैं। लैलूंगा में ‘आधार’ अब नागरिक की पहचान नहीं, बल्कि संचालकों के लिए ‘कुबेर का खजाना’ बन गया है।

नियमों का ‘एनकाउंटर’: सरकारी छत से एलर्जी?-शासन का आदेश है – “आधार सेंटर सरकारी बिल्डिंग में चलेगा।” लेकिन लैलूंगा के संचालकों को शायद सरकारी सीमेंट से एलर्जी है। जिला प्रशासन के आदेशों को ‘रद्दी की टोकरी’ के दर्शन कराकर, ये केंद्र निजी ठिकानों पर ऐसे ठाठ से चल रहे हैं जैसे कोई फाइव स्टार होटल हो।

गजब का लॉजिक : सरकारी भवन में पारदर्शिता का खतरा रहता है, और यहाँ तो खेल ही ‘अपारदर्शिता’ का है! डेटा की सुरक्षा का क्या है? वह तो राम भरोसे है, और राम जी अभी लैलूंगा के इन केंद्रों की तरफ देख नहीं रहे हैं।

राजेश भगत एंड कंपनी: ’75 का माल, डेढ़ सौ में लाल’ :लैलूंगा के मशहूर ‘आधार कलाकार’ राजेश भगत और उनकी टीम ने अर्थशास्त्र का एक नया नियम खोज निकाला है। इसे कहते हैं- “मजबूरी का टैक्स”।

  • ​सरकारी रेट लिस्ट के मुताबिक ₹75 होने चाहिए, लेकिन यहाँ का ‘सॉफ्टवेयर’ शायद अलग है, जो ऑटोमेटिकली इसे ₹150 कर देता है।
  • ​अगर आप ₹125 का काम कराने आए हैं, तो समझ लीजिए कि ₹250 की ‘श्रद्धांजलि’ दिए बिना आपका बायोमेट्रिक मशीन काम नहीं करेगी।
  • बहाना नंबर 1: “नया रेट लिस्ट अभी रास्ते में है, शायद पैदल आ रहा है इसलिए पहुँचा नहीं।” ग्रामीण बेचारे रसीद सरकारी रेट की लेते हैं और पैसे ‘प्राइवेट रेट’ के देते हैं। इस हुनर के लिए तो संचालकों को ‘भ्रष्टाचार रत्न’ से नवाजा जाना चाहिए।

    तहसीलदार का ‘जांच’ वाला झुनझुना :जब तहसीलदार शिवम पांडे साहब से इस बारे में पूछा गया, तो उन्होंने बहुत ही ‘मासूमियत’ से वही पुराना जुमला पकड़ा दिया-“शिकायत मिली है, जांच करेंगे।” वाह साहब! आदेश की धज्जियां महीनों से उड़ रही हैं, केंद्र सरेआम निजी घरों में चल रहे हैं, जनता चिल्ला रही है और प्रशासन अभी ‘जांच की फाइल’ में तेल डालने की तैयारी कर रहा है। शायद प्रशासन उस दिन का इंतजार कर रहा है जब संचालक खुद आकर कहेंगे – “हाँ साहब, हमने लूटा है, अब तो कार्रवाई कर लो!”

    कतार में खड़ा ‘डिजिटल इंडिया’ :सुबह 4 बजे से कतार में लगे उन बुजुर्गों और महिलाओं को देखिए, जो ‘डिजिटल इंडिया’ के इस शानदार अवतार को अपनी आँखों से देख रहे हैं। धूप में पसीना बहाते ग्रामीणों के लिए आधार अब ‘अधिकार’ नहीं, बल्कि ‘अत्याचार’ बन गया है। रसीद में कम पैसे और जेब से ज्यादा पैसे—यह जादू सिर्फ लैलूंगा के इन तीन केंद्रों में ही संभव है।

    जय हो लैलूंगा के तंत्र की!यहाँ नियम उनके लिए हैं जिनके पास रसूख नहीं है। जिनके पास सेटिंग है, उनके लिए जिला प्रशासन का आदेश केवल एक ‘व्हाट्सएप फॉरवर्ड’ से ज्यादा कुछ नहीं है। जनता अब टकटकी लगाकर देख रही है कि प्रशासन की ‘जांच’ वाली कछुआ चाल कब तक पूरी होती है या फिर मामला ‘ठंडे बस्ते’ की गहरी नींद में सो जाता है।

​सावधान: अगर आप लैलूंगा में आधार सुधरवाने जा रहे हैं, तो जेब में सरकारी रेट नहीं, ‘संचालक रेट’ लेकर जाएं, वरना सर्वर तो क्या, आपका नसीब भी डाउन रहेगा!

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