करमा पूजा जनजातीय आस्था का प्रतीक – प्रतियोगिता के रूप में आयोजन अनुचित : उराँव समाज लैलूँगा

लैलूंगा।छत्तीसगढ़ शासन द्वारा 24 अक्टूबर 2025 को जारी आदेश के तहत ग्राम से लेकर प्रदेश स्तर तक “करमा प्रतियोगिता” के आयोजन की घोषणा की गई है। इस निर्णय के जारी होने के पश्चात जनजातीय समाज में गहरी नाराजगी और विरोध की भावना व्याप्त है।


उराँव समाज,लैलूँगा – ने इस आयोजन को लेकर स्पष्ट आपत्ति दर्ज की है। समाज का कहना है कि करमा पूजा कोई मनोरंजनात्मक कार्यक्रम या प्रतियोगिता नहीं, बल्कि जनजातीय समाज की आत्मा और सांस्कृतिक पहचान का जीवंत प्रतीक है।
करमा पूजा : संस्कृति नहीं, आस्था का पर्व है
उराँव समाज के वरिष्ठ जनों ने कहा कि –
“करमा पूजा हमारे पूर्वजों की स्मृति, हमारी जीवनशैली और प्रकृति के प्रति हमारी कृतज्ञता का प्रतीक है। इसे प्रतियोगिता बनाना हमारी पूजा की पवित्रता को अंक और पुरस्कारों में बाँटने जैसा है, जो हमारी परंपरा के मूल स्वरूप का अपमान है।”
समाज ने यह भी कहा कि *पिछले वर्ष भी जब प्रशासनिक स्तर पर करमा प्रतियोगिता आयोजित करने की तैयारी की गई थी*, तब जनजातीय समाज के विरोध के बाद उसे निरस्त किया गया था।लेकिन इस वर्ष पुनः “करमा महोत्सव” के नाम पर उसी आयोजन को प्रतियोगिता स्वरूप में दोहराया जा रहा है, जिसे समाज ने *आस्था और संस्कृति पर आघात* के रूप में देखा है।
उराँव समाज की मांगें
समाज द्वारा प्रस्तुत ज्ञापन में निम्नलिखित प्रमुख माँगें रखी गई हैं –
1. करमा पूजा को किसी भी स्तर पर प्रतियोगिता के रूप में आयोजित न किया जाए।
2. यदि सांस्कृतिक संरक्षण उद्देश्य है, तो आयोजन को केवल “जनजाति सांस्कृतिक उत्सव” के रूप में मनाया जाए, जिसमें प्रतियोगिता का कोई स्वरूप न हो।
3. जनजातीय पूजा-पद्धति, विधि-विधान और विश्वास की गरिमा को बनाए रखने हेतु जनजातीय समाज की पूर्व सहमति से ही किसी कार्यक्रम की रूपरेखा तय की जाए।
ज्ञापन सौंपा गया
उराँव समाज लैलूँगा इकाई के प्रतिनिधियों द्वारा इस संबंध में राज्य के यशस्वी मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय जी के नाम ज्ञापन* स्थानीय अनुविभागीय अधिकारी (लैलूँगा) को सौंपा गया है।ज्ञापन में समाज ने करमा पूजा को प्रतियोगिता स्वरूप में मनाने के शासनादेश को तत्काल निरस्त करने तथा इस पर्व की पवित्रता एवं पारंपरिक स्वरूप की रक्षा करने की मांग की है।
समाज की अपील
उराँव समाज लैलूँगा का यह स्पष्ट मत है कि –
“हम संवाद और सहयोग के पक्षधर हैं, लेकिन हमारी आस्था, संस्कृति और पूजा-पद्धति के साथ किसी भी प्रकार का प्रयोग या प्रतियोगिता स्वीकार्य नहीं है। करमा पूजा हमारी जनजातीय अस्मिता का प्रतीक है, इसका सम्मान शासन-प्रशासन सभी को करना चाहिए।”
समाज ने प्रदेश शासन से आग्रह किया है कि करमा पूजा को सांस्कृतिक सम्मान के साथ मनाने की पहल करें, न कि प्रतिस्पर्धा के माध्यम से उसकी पवित्रता को आहत करें।

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