तमनार का ‘अदृश्य’ महोत्सव: जहाँ जन के बिना ‘सुनवाई’ हुई और लोकतंत्र ने ‘मौन व्रत’ धारण कर लिया…

रायगढ़। जिले के तमनार स्थित गारे पेलमा सेक्टर-1 खदान क्षेत्र में इन दिनों लोकतंत्र का एक ऐसा ‘अति-आधुनिक’ और ‘परिष्कृत’ प्रयोग चल रहा है, जिसे देखकर यूनान के महान दार्शनिक भी चकित रह जाएं। यहाँ प्रशासन ने यह सिद्ध कर दिखाया है कि ‘जनसुनवाई’ जैसी जटिल प्रक्रिया को ‘जनता’ के कष्टकारी हस्तक्षेप के बिना भी कितनी सफलतापूर्वक संपन्न किया जा सकता है।

कुशल प्रबंधन : जब ‘लोक’ बाहर रहा और ‘तंत्र’ भीतर मुसकुराया –बीते 8 दिसंबर को तमनार के क्षितिज पर प्रशासनिक कौशल का सूर्योदय हुआ। 14 ग्रामों के हजारों निवासी, जो अपनी माटी की रक्षा के लिए एकत्रित हुए थे, द्वार पर ही विनम्रतापूर्वक पुलिसिया सुरक्षा के साये में रोक दिए गए। प्रशासन की संवेदनशीलता प्रशंसनीय है—उन्हें संभवतः यह भय था कि यदि जनता भीतर आ गई, तो जनसुनवाई का ‘शांतिपूर्ण’ और ‘निर्विरोध’ स्वरूप कहीं खंडित न हो जाए।

अत: भारी सुरक्षा के अभेद्य चक्र में, केवल फाइलों और कंपनी के प्रतिनिधियों की पावन उपस्थिति में, वह ‘सीक्रेट’ अनुष्ठान संपन्न हुआ जिसे सरकारी शब्दावली में जनसुनवाई कहते हैं।

आर्थिक नाकेबंदी : सड़कों पर ‘आध्यात्मिक’ प्रतीक्षा –पिछले 8 दिनों से 14 ग्रामों के आदिवासी सड़कों पर ‘आर्थिक नाकेबंदी’ का उत्सव मना रहे हैं। प्रशासन का धैर्य इतना अगाध है कि उसने इन प्रदर्शनकारियों को उनके हाल पर छोड़कर यह सिद्ध कर दिया है कि “प्रतीक्षा ही सबसे बड़ा तप है।” *
- प्रशासनिक दूरदर्शिता : शासन को कदाचित् यह विश्वास है कि इस कड़ाके की शीत लहर में सड़कों पर जलती हुई मशालें और आदिवासियों के नारे वास्तव में किसी प्रतिरोध का स्वर नहीं, बल्कि विकास की नई गाथा के लिए किया गया ‘सामूहिक कीर्तन’ है।
- चुप है व्यवस्था : कोयले के पहिए थमे हुए हैं, व्यावसायिक लाभ की गति अवरुद्ध है, किंतु प्रशासन का मौन इतना परिष्कृत है कि उसे जनता की दहाड़ में भी ‘असीम शांति’ का अनुभव हो रहा है।
विकास का ‘गुप्त’ सिद्धांत : लोकतंत्र की नई परिभाषा अब तमनार की धूल भरी गलियों में लिखी जा रही है: “जनता से पूछना तो एक औपचारिकता है, असली विकास तो वह है जो जनता की जानकारी के बिना, उनकी सहमति के नाम पर, उन्हीं के विरुद्ध कर दिया जाए।” साहबों ने कागजों पर खदान की नींव रख दी है, अब केवल उस भूमि का अधिग्रहण शेष है जहाँ फिलहाल वह ‘तुच्छ’ जनता निवास करती है जो स्वयं को इस लोकतंत्र का स्वामी समझने की भूल कर बैठी है।
तमनार का यह संघर्ष वास्तव में ‘फर्जी फाइलों’ और ‘असली इंसानों’ के बीच का युद्ध है। प्रशासन ने अपनी ओर से तो ‘मैच’ जीत लिया है क्योंकि रेफरी भी उन्हीं का था और नियम भी उन्हीं के। अब देखना यह है कि 14 गांवों का यह ‘जन-सैलाब’ व्यवस्था के इस काल्पनिक महल को कब तक अपनी नाकेबंदी से चुनौती देता रहता है।
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