“कागज़ी दिव्यांगों का काला साम्राज्य!” : घरघोड़ा में दिव्यांग कोटे की नौकरियों पर फर्जीवाड़े का बड़ा खुलासा, असली हकदारों का हक छीना गया?
मेडिकल बोर्ड, बिचौलियों और रसूखदारों के गठजोड़ से सरकारी नौकरी पाने का खेल! अब उठ रही निष्पक्ष जांच और एफआईआर की मांग
घरघोड़ा | रायगढ़।
रायगढ़ जिले के घरघोड़ा क्षेत्र में दिव्यांग आरक्षण के नाम पर कथित तौर पर वर्षों से चल रहे एक बड़े फर्जीवाड़े की परतें खुलने लगी हैं। विशेष पड़ताल में ऐसे चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं, जिन्होंने सरकारी भर्ती व्यवस्था, मेडिकल प्रमाणन प्रक्रिया और प्रशासनिक निगरानी पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
आरोप है कि क्षेत्र के कई प्रभावशाली परिवारों और रसूखदार व्यक्तियों ने फर्जी दिव्यांगता प्रमाण पत्रों का सहारा लेकर सरकारी नौकरियों में दिव्यांग आरक्षण का लाभ हासिल किया। जबकि वास्तव में वे पूरी तरह स्वस्थ हैं और सामान्य रूप से अपना कार्य कर रहे हैं।
⚠️ फर्जी प्रमाण पत्रों का खेल, मेडिकल बोर्ड पर भी उठे सवाल
सूत्रों के अनुसार इस पूरे मामले में केवल फर्जी दस्तावेज बनाना ही नहीं, बल्कि एक संगठित नेटवर्क के सक्रिय होने की आशंका जताई जा रही है। आरोप है कि कुछ बिचौलियों और मेडिकल प्रमाणन प्रक्रिया से जुड़े लोगों की मिलीभगत से ऐसे प्रमाण पत्र जारी किए गए, जिनके आधार पर कई लोगों ने शासकीय सेवाओं में नियुक्तियां प्राप्त कर लीं।
जानकारी यह भी सामने आ रही है कि कुछ कर्मचारियों को सरकारी रिकॉर्ड में 40 प्रतिशत से 60 प्रतिशत तक दिव्यांग दर्शाया गया है, जबकि वास्तविक जीवन में वे किसी भी प्रकार की स्पष्ट शारीरिक अक्षमता से ग्रसित दिखाई नहीं देते।
यदि यह आरोप सत्य साबित होते हैं, तो यह केवल भर्ती नियमों का उल्लंघन नहीं बल्कि शासन की सामाजिक न्याय आधारित आरक्षण व्यवस्था पर सीधा हमला माना जाएगा।
🚨 असली दिव्यांग युवाओं के साथ अन्याय?
इस कथित घोटाले का सबसे दर्दनाक पहलू यह बताया जा रहा है कि क्षेत्र के वास्तविक दिव्यांग युवक-युवतियां आज भी रोजगार की तलाश में भटक रहे हैं। वैध दिव्यांगता प्रमाण पत्र और आवश्यक योग्यता होने के बावजूद उन्हें अवसर नहीं मिल पाया, क्योंकि उनकी सीटों पर कथित “कागज़ी दिव्यांग” कब्जा जमाकर बैठे हुए हैं।
ग्रामीणों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि दिव्यांग आरक्षण का उद्देश्य समाज के कमजोर और वंचित वर्ग को अवसर देना था, लेकिन यदि फर्जीवाड़ा हुआ है तो सबसे बड़ा नुकसान उन्हीं जरूरतमंद युवाओं को हुआ है जिनके लिए यह व्यवस्था बनाई गई थी।
🔍 दूसरे जिले के मेडिकल बोर्ड से जांच कराने की मांग
स्थानीय नागरिकों ने मांग की है कि जिन कर्मचारियों ने दिव्यांग कोटे से नौकरी प्राप्त की है, उनकी मेडिकल जांच किसी स्वतंत्र एवं निष्पक्ष मेडिकल बोर्ड से कराई जाए। जांच स्थानीय स्तर के बजाय राज्य स्तरीय या किसी अन्य जिले के विशेषज्ञ बोर्ड से हो, ताकि निष्पक्षता बनी रहे।
लोगों का मानना है कि यदि पुनः चिकित्सकीय परीक्षण कराया जाए तो वर्षों से दबे हुए कई राज सामने आ सकते हैं।
⚖️ एफआईआर, बर्खास्तगी और वेतन वसूली की उठी मांग
मामले को लेकर क्षेत्र में आक्रोश बढ़ता जा रहा है। नागरिकों ने प्रशासन से मांग की है कि—
दिव्यांग कोटे से हुई सभी नियुक्तियों की विशेष जांच कराई जाए।
संदिग्ध कर्मचारियों के दस्तावेजों का सत्यापन कराया जाए।
फर्जी प्रमाण पत्र पाए जाने पर तत्काल एफआईआर दर्ज हो।
दोषियों को सेवा से बर्खास्त किया जाए।
नौकरी के दौरान प्राप्त वेतन और अन्य शासकीय लाभों की भू-राजस्व की भांति वसूली की जाए।
*फर्जी प्रमाण पत्र बनाने और जारी करने वालों पर भी कठोर कार्रवाई हो*।
📢*अब बड़े नामों का खुलासा बाकी!*
सूत्रों का दावा है कि यह मामला केवल कुछ व्यक्तियों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी जड़ें काफी गहरी हो सकती हैं। कई बड़े नाम, बिचौलिये और कथित लाभार्थी जांच के दायरे में बताए जा रहे हैं।
इस पूरे मामले से जुड़ी दस्तावेजी जानकारी, संदिग्ध नियुक्तियों की सूची और अन्य अहम तथ्यों का खुलासा आगामी रिपोर्टों में किया जाएगा।
🔥 *सवाल जो जवाब मांग रहे हैं…*
क्या दिव्यांग आरक्षण को सुनियोजित तरीके से लूटा गया?
क्या मेडिकल प्रमाणन प्रक्रिया में भ्रष्टाचार हुआ?
क्या असली दिव्यांग युवाओं का हक छीनकर फर्जी लाभार्थियों को नौकरी दी गई?
*क्या प्रशासन इस कथित घोटाले की निष्पक्ष जांच कराएगा?*
फिलहाल पूरे क्षेत्र की निगाहें प्रशासन की कार्रवाई पर टिकी हैं। यदि आरोपों में सच्चाई है, तो यह घरघोड़ा क्षेत्र का ही नहीं बल्कि पूरे जिले की भर्ती व्यवस्था से जुड़ा एक बड़ा घोटाला साबित हो सकता है।
(नोट: समाचार में लगाए गए आरोप स्थानीय सूत्रों एवं प्राप्त जानकारियों पर आधारित हैं।)
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