घरघोड़ा तहसील से कलेक्ट्रेट तक जमीन दलालों का नेटवर्क?
जमीन की दलाली के साथ तहसील के काम, मुआवजा और राजस्व मामलों में “सेटिंग” का खेल! ग्रामीणों के बीच बढ़ रही शिकायतें
घरघोड़ा। घरघोड़ा क्षेत्र में जमीन की खरीद-बिक्री का कारोबार इन दिनों तेजी से बढ़ रहा है। जमीनों के बढ़ते दाम के बीच प्रॉपर्टी डीलरों और बिचौलियों की सक्रियता भी चर्चा में है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि जमीन के सौदों तक सीमित रहने के बजाय कुछ बिचौलिए अब तहसील और राजस्व कार्यालयों से जुड़े कामों को भी “सेटिंग” के जरिए कराने का दावा कर रहे हैं।

सबसे गंभीर सवाल यह है कि क्या जमीन दलालों का नेटवर्क केवल जमीन की खरीद-बिक्री तक सीमित है, या इसकी पहुंच तहसील से लेकर जिला स्तर के राजस्व कार्यालयों तक है? इन आरोपों की स्वतंत्र जांच की जरूरत महसूस की जा रही है।
🚨 जमीन के साथ अब “सरकारी काम कराने” का दावा?
स्थानीय स्तर पर चर्चा है कि कुछ बिचौलिए ग्रामीणों से यह कहते नजर आते हैं कि नामांतरण, सीमांकन, बंटवारा, डायवर्सन, रिकॉर्ड सुधार, नजूल संबंधी प्रकरण, जमीन विवाद, मुआवजा एवं अन्य राजस्व मामलों में वे संबंधित अधिकारी-कर्मचारियों से संपर्क कर काम करा सकते हैं।
भोले-भाले ग्रामीण, जिन्हें तहसीली प्रक्रिया और नियमों की पूरी जानकारी नहीं होती, ऐसे लोगों के झांसे में आने की आशंका रहती है। सवाल यह है कि यदि कोई व्यक्ति सरकारी कार्यालय के सामान्य काम को “सेटिंग” के नाम पर कराने के लिए रकम ले रहा है, तो उसकी वैधता और भूमिका की जांच कौन करेगा?
🔥 जमीन की कीमत और दलाली का खेल
घरघोड़ा और आसपास के औद्योगिक एवं विकासशील क्षेत्रों में जमीन के बढ़ते दाम ने जमीन के कारोबार को बेहद आकर्षक बना दिया है। आरोप है कि कुछ बिचौलिए जमीन मालिकों से कम कीमत पर सौदा तय करने के बाद उसी जमीन के लिए ऊंची कीमत वाले खरीदार तलाशते हैं और बीच का बड़ा अंतर बतौर मुनाफा अपने पास रखते हैं।
कई जगहों पर जमीन की वास्तविक सौदेबाजी और दस्तावेजों में दर्शाई जाने वाली कीमत को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं। यदि वास्तविक लेन-देन और दस्तावेजी मूल्य में अंतर है तो यह राजस्व एवं पंजीयन व्यवस्था के लिए गंभीर जांच का विषय हो सकता है।
🚨 नजूल और पट्टे की जमीन पर भी उठ रहे सवाल
क्षेत्र में नजूल जमीन तथा विभिन्न प्रकार की पट्टे वाली जमीनों की खरीद-बिक्री को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। कौन सी जमीन हस्तांतरण योग्य है, किस जमीन पर प्रतिबंध है और किन परिस्थितियों में अनुमति जरूरी है, इसकी जांच किए बिना सौदे किए जाने पर भविष्य में खरीदार और विक्रेता दोनों कानूनी विवाद में फंस सकते हैं।
👀 तहसील कार्यालय के आसपास सक्रिय बिचौलियों पर निगरानी जरूरी
स्थानीय लोगों का कहना है कि तहसील कार्यालय के आसपास अक्सर ऐसे लोग सक्रिय दिखाई देते हैं जो ग्रामीणों के दस्तावेज देखकर उनके काम की जानकारी लेते हैं और फिर संबंधित विभाग में काम कराने का भरोसा देते हैं।
मुआवजा प्रकरण हो, जमीन का रिकॉर्ड सुधारना हो, नामांतरण हो, सीमांकन हो या कोई अन्य राजस्व कार्य—हर काम के लिए यदि ग्रामीणों को बिचौलियों का सहारा लेना पड़ रहा है, तो यह प्रशासन की कार्यप्रणाली पर भी बड़ा सवाल है।
💥 कलेक्टर के सामने जांच की चुनौती
सबसे बड़ा सवाल अब जिला प्रशासन से है—क्या घरघोड़ा तहसील एवं आसपास सक्रिय प्रॉपर्टी डीलरों और बिचौलियों की भूमिका की जांच होगी?
क्या यह पता लगाया जाएगा कि कौन लोग लगातार राजस्व कार्यालयों में घूमकर ग्रामीणों के काम कराने के नाम पर रकम लेते हैं? क्या उनके पास किसी प्रकार का अधिकृत प्राधिकार है? क्या मुआवजा और राजस्व मामलों में बाहरी व्यक्तियों की भूमिका की जांच होगी? और यदि अधिकारी-कर्मचारियों के नाम पर ग्रामीणों से रकम वसूली जा रही है, तो उस रकम का वास्तविक लेन-देन किसके माध्यम से हो रहा है?
⚠️ आरोपों की जांच जरूरी, दोष साबित होने तक जिम्मेदारी तय नहीं
जमीन दलाली, सरकारी काम कराने के नाम पर वसूली अथवा अधिकारी-कर्मचारियों से कथित “सेटिंग” जैसे आरोपों की निष्पक्ष जांच जरूरी है। यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो संबंधित बिचौलियों के साथ-साथ उनकी मदद करने वाले किसी भी अधिकारी-कर्मचारी की भूमिका पर भी नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए।
वहीं, यदि आरोप निराधार हैं तो प्रशासन को भी जांच के माध्यम से स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए, ताकि आम नागरिकों के बीच राजस्व व्यवस्था को लेकर पैदा हो रही शंकाओं का समाधान हो सके।
अब निगाहें जिला प्रशासन पर हैं—क्या घरघोड़ा में जमीन के कारोबार के साथ कथित “सेटिंग सिस्टम” की भी जांच होगी, या फिर तहसील के आसपास सक्रिय बिचौलियों का खेल यूं ही चलता रहेगा?
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